अगर ये कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि समाजवादी दायरे में जदयू की भी जरूरत है भाजपा..पढिए विशेष रिपोर्ट

जनता दल (यू), यानी बड़े नेताओं की छोटी, लेकिन सोच के स्तर पर राष्ट्रीय पार्टी। यही

कारण है कि गठबंधन राजनीति में जदयू भाजपा के कुछ सबसे विश्वस्त सहयोगियों में से एक है। केंद्रीय स्तर पर भी जदयू को भरोसे का दल माना जाता रहा है।

बीच में भाजपा से जदयू की दोस्ती जरूर टूटी और राजद से मेलजोल हुआ, लेकिन यह ज्यादा लंबा चला नहीं। इसका कारण भी बड़े नेतृत्व के बीच टकराव रहा, जबकि भाजपा से दोबारा दोस्ती का कारण वही राष्ट्रीय और समाजवादीसोच रही।

एक मायने में भाजपा-जदयू को स्वाभाविक दोस्त कहा जा सकता है। बिहार में भाजपा और जदयू की दोस्ती

करीब ढाई दशक पुरानी है। ऐसे में 2013-14 का काल बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर गया था, जब दोनों की दोस्ती टूटी और फिर अलग-अलग लड़ाई में भाजपा ने बढ़त बना ली थी। हालांकि बाद में विधानसभा चुनाव

में जदयू यह साबित करने में सफल रहा कि वह बिहार में जिसके साथ खड़ा होगा, उसका पलड़ा भारी होगा।

वस्तुत: अलगाव के बाद फिर से पुराने दोस्तों का गले मिलना भाजपा और जदयू दोनों की मजबूरी थी। गठबंधन

राजनीति में भाजपा का साथ जदयू को भाता है, जबकि जदयू का साथ भाजपा को मजबूत बनाता है। लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं कि दोनों के विचार हर मुद्दे पर एक जैसे हैं।

जहां तक जदयू के सामाजिक सरोकार और सियासी आग्रहों का सवाल है तो वह अपनी पहचान भाजपा में तिरोहित नहीं करना चाहेगा। यही कारण है कि बीच-बीच में वह भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे से इतर अपने रुख-रवैये का खुलकर इजहार करने से भी नहीं चूकता।

मोटे तौर पर भाजपा को इससे कोई दिक्कत भी नहीं है। कुल मिलाकर भाजपा को बिहार में नीतीश की अगुआई स्वीकार है। बदले में नीतीश को भी समाजवादी दायरे में रहकर प्रदेश में भाजपा को अपनी नीतियों को आगे

बढ़ाने से कोई गुरेज नहीं है। 

नीतीश ने अपराध नियंत्रण और विकास के मोर्चे पर बड़े जतन से अपनी छवि को ‘सुशासन बाबू’ के तौर पर स्थापित किया है। शराबबंदी ने भी उन्हें महिलाओं के बीच लोकप्रिय बनाया है। लिहाजा वह अपनी इस छवि से समझौता नहीं करेंगे। यही जरूरत उन्हें भाजपा का स्वाभाविक सहयोगी भी बनाती है।

मौजूदा सियासी परिदृश्य में जहां तक बिहार में गठबंधन को लेकर जदयू और भाजपा के अंतरसंबंधों का सवाल है तो फिलहाल इसके आगे बने रहने के संकेत हैं। ध्यान रहे कि जदयू ही शायद ऐसी अकेली क्षेत्रीय पार्टी थी, जिसने महिला आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के साथ कदमताल करने का निर्णय लिया था। यह और

बात है कि इसे लेकर पार्टी के अंदर ही लड़ाई छिड़ गई थी।

नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर भी जदयू का रुख बाकियों से अलग रहा था। दरअसल नीतीश के नेतृत्व में पार्टी ने यह साबित किया है कि एक सहयोगी के रूप में जदयू केंद्र में राष्ट्रीय सरोकारों को पूरा करने में अहम साथी हो सकता है।

जदयू के वैचारिक मूल में समाजवादी सरोकार बेशक हैं, लेकिन वर्तमान राजनीति के व्यावहारिक पक्ष को भी इसने एक हद तक आत्मसात कर लिया है। उसे कुछ शर्तों के साथ भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे से भी कोई दिक्कत नहीं है। यही कारण है कि अपने स्थापना काल से ही भाजपा के साथ उसका रिश्ता है, जो आज भी कायम है।

भारतीय राजनीति में यह राष्ट्रवाद और समाजवाद के परस्पर सम्मिलन का अनूठा उदाहरण भी है। लालू

के शासनकाल की कुछ समस्याएं दोनों दलों की दोस्ती का मूलाधार हैं। फिर बिहार की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितयां भी भाजपा और जदयू के गठजोड़ को स्वाभाविक और सहज बनाती हैं।

उलझे हुए जातीयसमीकरणों के चलते भी दोनों की मित्रता अपरिहार्य सी बन गई है। यहां दोनों एक दूसरे

के पूरक हैं। दोनों को एक दूसरे की जरूरतहै और इसमें किसी को कुछ खोना नहीं है।

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