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अरे मेरे दोस्त कलह का क्लाइमेक्स तो अभी बाकी है

619638815-akhileshshivpalmulayam_6आप में से जिन लोगों ने श्री लाल शुक्ल का राग दरबारी पढ़ा हो। वे मुलायम कुनबे की कलह या अब कह ले संग्राम का कहीं अधिक रस ले सकते हैं। दोनों में ही सत्ता की सियासत है। यहां एक पूरे सूबे की सत्ता है। वहां कालेज की मैनेजिंग कमेटी और को-ओपरेटिव पर कब्जा करने की सियासत थी। राज दरबारी के मुख्य पात्र वैद्य जी थे। यहां मुलायम सिंह यादव नेताजी है। राग दरबारी में भी कालेज की सियासत के सवाल पर वैद्य जी के कुनबे में कलह होती है। जब वैद्य जी के छोटे बेटे रुप्पन बाबू ही उनके खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। आज तकरीबन वही स्थिति नेताजी के कुनबे में हैं। बेटे अखिलेश ने ही नेताजी के खिलाफ  मोर्चा खोल दिया है। वैद्य जी के बड़े बेटे यानी बड़े पहलवान कलह में पिता का साथ देते हैं। यहां नेताजी के छोटे भाई शिवपाल यादव नेताजी का साथ निभा रहे हैं। बहरहाल, आज नेताजी के कुनबे का संग्राम चरम पर है। सोमवार को नेताजी ने महाबैठक क्या बुलाई। कुनबे का संग्राम सड़क पर आ गया। महाबैठक शुरु हुई तो मुलायम के कहने पर अखिलेश और शिवपाल गले भी मिले। पर यह सद्भाव अधिक देर नहीं टिक सका। बैठक में ही दोनों के बीच तीखी नोंकझोंक हुई। जब अखिलेश ने आरोप लगाया कि अमर सिंह ने मेरे बारे में एक अखबार में लिखवाया कि मैं औरंगजेबहूं। इसके बाद शिवपाल यादव ने माइक छीनकर कहा कि वह झूठ बोल रहे हैं। नेताजी भी अखिलेश पर जमकर बरसे। कहा, ‘सत्ता मिलते ही दिमाग खराब हो गया है।सपा कार्यालय के बाहर अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के समर्थकों के बीच जमकर नारेबाजी और हाथापाई हुई। पुलिस को समर्थकों को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग तक करना पड़ा। अब अखिलेश और मुलायम के दो गुट बन चुके हैं। और तुर्रा यह कि दोनों एक-दूसरे पर भाजपा  से सांठगांठ का आरोप लगा रहे हैं। रामगोपाल ने शिवपाल पर भाजपा के साथ सांठगांठ का आरोप लगाया है। बकौल रामगोपाल हमारे ही घर के कुछ लोग बीजेपी से तीन बार मिल चुके हैं।तो शिवपाल ने भी रामगोपाल को भाजपा का एजेंट बताया। पिछले कुछ महीनों से अहंकार और अधिकार के टकराव के बरक्स जारी कलह में खेमे तकरीबन अब साफ  हो चुके हैं। एक और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके चाचा रामगोपाल यादव हैं। तो उनके सामने हैं उनके पिता और पार्टी के संस्थापक पुरोधा मुलायम सिंह यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव। रविवार को 200 से अधिक नेताओं के साथ बैठक करते हुए अखिलेश ने सबसे बड़ा निर्णय लेते हुए चाचा शिवपाल यादव के अलावा उनके करीबे समझे जाने वाले मंत्रियों गायत्री प्रजापति, ओम प्रकाश सिंह, नारद राय, शादाब फातिमा और मदन चौहान को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। साथ ही अमर सिंह की करीबी जयाप्रदा को उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद् की उपाध्यक्ष के पद से भी हटा दिया। उनने जिस तरह से अमर सिंह को निशाना बनाते हुए उन पर परिवार में फूट डालने का आरोप लगाया। उससे अब उनके निशाने पर सीधे-सीधे मुलायम सिंह यादव आ गए। क्योंकि कुछ सप्ताह पहले ही मुलायम ने अमर सिंह को पार्टी का महासचिव नियुक्त किया था। अखिलेश ने तो अमर को दलाल बताते हुए यहां तक कह दिया कि अमर सिंह का कोई भी करीबी मंत्रिमंडल में नहीं रहेगा। जिस पर मुलायम ने अखिलेश की हैसियत पूछ डाली। यानी अखिलेश की सियासत एक आउटसाइडर अमर सिंह को सारे फसाद की जड़ बताकर यह साबित करने की है कि उनके और नेताजी के बीच कोई विवाद नहीं है। जैसा कि रामगोपाल भी अपनी चिट्ठी में लिखते हैं कि इस वक्त वह (नेताजी) जरूर कुछ आसुरी शक्तियों से घिरे हुए हैं। जब वह उन ताकतों से मुक्त होंगे। तब उन्हें सच्चाई का एहसास होगा। पर सवाल है कि कुनबे के संग्राम की परिणति क्या होगी? क्या अखिलेश और रामगोपाल मिल कर नई पार्टी बनाएंगे? क्योंकि मौजूदा हालात यानी शिवपाल और अमर सिंह के रहते उनका सपा से चुनाव लड़ पाना अब मुमकिन नहीं दिख रहा। वैसे भी नेताजी यह एलान कर चुके हैं कि वे शिवपाल और अमर सिंह का साथ नहीं छोड़ सकते। हालांकि तमाम कलह और शिवपाल की पक्षधरता के बाद भी नेताजी का पुत्रमोह कम होता नजर नहीं आ रहा। वे अब भी अपनी उसी बात पर कायम हैं कि उनकी सियासी विरासत को अखिलेश संभालेंगे और पार्टी संगठन शिवपाल के जिम्मे होगा। पर अहम सवाल है कि क्या यह स्थिति अखिलेश को स्वीकारेंगे? यानी कुनबे की सियासत और सपा के भविष्य का अब सारा दारोमदार अखिलेश पर ही है। वे मौजूदा हालत को स्वीकारते है। या फिर अपनी अलग राह लेते हैं। पहली स्थिति में उन्हें शिवपाल पर संगठन का छोड़ना होगा। दूसरी स्थिति में उनकी सिर्फ  अपनी छवि साथ होगी। संगठन उन्हें फिर से खड़ा करना पड़ेगा। चुनाव अब सिर पर है। क्या इतने कम समय में वे कर पायेंगे? जो भी हो, फैसला अखिलेश को ही लेना होगा। और वह भी जल्द ही। जहां तक सवाल नेताजी का है। राग दरबारी के वैद्य जी ने अपने बगावती बेटे रुप्पन बाबू के बजाए बड़े पहलवान का साथ दिया था। यहां भी नेताजी फिलहाल अखिलेश के बजाए शिवपाल के साथ दिख रहे हैं। पर उनका पुत्रमोह तो कम होता नहीं दिख रहा। यानी कहानी का क्लाइमेक्स अभी आगे है।

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