कुछ दिनों बाद 14 को नहीं 15-16 को खा सकेंगे खिचड़ी

हिन्द न्यूज़ डेस्क : जनवरी के आते ही लोग मकर-संक्रांति का बहुत ही बेसब्री से इंतजार करने लगते है. और हो भी क्यों न दान-पुण्य करने का इससे अच्छा समय और कौन हो सकता है. मकर-संक्रांति वैसे तो महीने की 14 तारीख को मनाया जाता है लेकिन ज्योतिषियों का मानना है कि कुछ दिनों बाद यह फेस्टिवल जनवरी महीने की 15-16 तारीख को मनाया जाने लगेगा. यही नहीं ऐसा इसलिए है क्योकि पंडितों की माने तो  सन् 2047 के बाद अधिकांश बार 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति आएगी. ऐसा अधिकमास व क्षय मास के कारण होगा.

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पहले 12 व 13 जनवरी को मनाई जाती थी मकर संक्रांति

सन् 1900 से 1965 के बीच 25 बार मकर संक्रांति 13 जनवरी को मनाई गई थी.उससे भी पहले यह पर्व कभी 12 को तो कभी 13 जनवरी को मनाया जाता था. पं. लोकेश जागीरदार (खरगोन) के अनुसार, स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था.उनकी कुंडली में सूर्य मकर राशि में था यानी उस समय 12 जनवरी को मकर संक्रांति थी। 20 वीं सदी में मकर संक्रांति 13-14 जनवरी को, वर्तमान में 14 तो कभी 15 जनवरी को आती है। 21वीं सदी समाप्त होते-होते मकर संक्रांति 15-16 जनवरी को मनाई जाने लगेगी.

इसलिए आता है मकर संक्रांति की तारीख में अंतर

सूर्य हर महीने राशि परिवर्तन करता है. एक राशि की गणना 30 अंश की होती है. सूर्य एक अंश की लंबाई 24 घंटे में पूरी करता है। पंचांगकर्ता डॉ. विष्णु कुमार शर्मा (जावरा) के अनुसार, अयनांश गति में अंतर के कारण 71-72 साल में एक अंश लंबाई का अंतर आता है.अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से एक वर्ष 365 दिन व छह घंटे का होता है, ऐसे में प्रत्येक चौथा वर्ष लीप ईयर भी होता है. चौथे वर्ष में यह अतिरिक्त छह घंटे जुड़कर एक दिन होता है.इसी कारण मकर संक्रांति हर चौथे साल एक दिन बाद मनाई जाती है.

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हर साल आधे घंटे की देरी

प्रतिवर्ष सूर्य का आगमन 30 मिनट के बाद होता है. हर तीसरे साल मकर राशि में सूर्य का प्रवेश एक घंटे देरी से होता है. 72 वर्ष में यह अंतर एक दिन का हो जाता है. हालांकि अधिकमास-क्षयमास के कारण समायोजन होता रहता है.

 

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