क्या वाकई बाबरी विध्वंस में बजरंगबली ने अपनी भूमिका निभाई ?

हम आपको रोज़ाना कई एेसे धार्मिक किस्सों के बारे में बताते हैं जिसके बारे में बहुत से लोगों को जानकारी होती है तो बहुत से लोग उस जानकारी से अंजान भी होते हैं। लेकिन आज हम आपको एक एेसे प्रसंग के बारे में बताने जा रह हैं, जिसका शायद हम दावा कर सकते हैं कि आप में से बहुत कम लोग इस प्रंसग के बारे में जानते होंगे। तो आइए आपको बताते हैं इस किस्से के बारे में- 

आज हम आज़ादी के बाद होने वाले दंगों में से सबसे संवेदनशील दंगों के बारे में बताने जा रहे हैं। इस एक दंगे ने भारत के राजनेताओं को झकझोर कर रख दिया है। आज इस वीडियो के जरिए हम आपको बाबरी ढांचा विध्वंस के बारे में कुछ ऐसी जानकारी देने वाले हैं। जिसका आपको अंदाज़ा भी नहीं होगा। दोस्तों ये एक ऐसा मुद्दा है जिसकी गूंज आज भी भारत की राजनीति में सुनाई देती है। हम जिक्र कर रहे हैं 30 अक्टूबर 1990 का। इस दिन ही पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बाबरी ढांचे को बचाने के लिए उसपर पुलिस और सैनिकों की परतें जमा दी थी। जी हां मुलायम सिंह यादव ने कुछ 40 हज़ार सैनिकों को एकजुट कर दिया था। और इस बात का दावा किया था कि अब बाबरी ढांचा तो छोड़िये पूरे अयोध्या में कोई परिंदा पर नहीं मार सकता है। मुलायम सिंह का ये दावा कोई हवाई दावा नहीं था। उन्होंने पूरे पुलिस बल और सैनिकों की तैनाती कर अयोध्या को छावनी में तबदील कर दिया था। अयोध्या की तरफ जाने वाली ट्रेनों और बसों को रोक दिया गया था। अयोध्या स्थित बाबरी ढांचे की तरफ जानेवाले हर रास्ते पर उस समय कुछ दिखाई देता था तो बस बैरिकेडिंग और कुछ जवान। क्योंकि उस रास्ते जाने वाले हर मार्ग को सील कर दिया गया था। 
पूरे देश से कोई भी ऐसा अयोध्या तक पहुंचने का रास्ता नहीं बचा था जो सील न किया गया हो। कई बार रामभक्त के द्वारा सुरक्षा प्रबंधों को तोड़ने की भी नकामयाब कोशिश की गई। लेकिन अपनी मानसिक और शारीरिक बल दोनों लगाने के बाद भी वे कुछ कर न सके। और बड़ी मेहनत के बाद जब कारसेवकों ने बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश तो पुलिस के जवानों ने भयंकर लाठीचार्ज कर दिया। जिसमें रामभक्त समेत विश्व हिंदु परिषद के लोग भी लहुलुहान हो गए। पर बैरिकेडिंग नहीं तोड़ सके। तब हुआ कुछ ऐसा। जिसे चमत्कार कहें या करिश्मा। कि एक अकेले साधारण से दिखने वाले साधु ने वो कर दिखाया जो रामभक्तों की भीड़ नहीं कर पाई। और हार कर एक किनारे बैठ गई थी। बाबरी ढांचे से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित हनुमानजी के विश्वविख्यात मन्दिर हनुमानगढ़ी के बंद कपाट अचानक खुले थे। और मात्र एक भगवा लंगोट पहने हुए एक साधु तेजी के साथ हनुमानगढ़ी से निकला और छलांगे मारते हुए हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों से उतरकर वहां खड़ी PAC की बस पर चढ़ गया। और बस में अंदर जाकर ड्राइविंग सीट सम्भाल ली जिसके बाद पलक झपकते ही वो बस रास्ते में लगी बैरिकेडिंगों को रौंदते हुए बाबरी ढांचे की तरफ दौड़ने लगी। इस मंजर को देखकर तो सभी पुलिस जवान हक्के-बक्के रह गए। दरअसल वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि ये क्या हो रहा। वो तो बस उस साधु को सबकुछ तहस-नहस करते देख रहे थे। जो रास्ते में लगी दर्जनों बेरिकेडिंगों को रौंदते हुए कुछ ही पलों में बाबरी ढांचे तक पहुंच गया था। एक तरफ जहां पुलिस के जवान अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ रामभक्त कारसेवकों का सैलाव रौंदी गयी बेरिकेडिंगों को पार करते हुए, बस के पीछे-पीछे चलते हुए बाबरी ढांचे की ओर पहुंच रहा था। कुछ ही पलों में मुलायम सिंह का दावा रेत के टीले की तरह बिखर कर रह गया। इस चमत्कारिक मंजर को जबतक पुलिसबल समझ पाता।
तबतक बाबरी ढांचा हज़ारों रामभक्त कारसेवकों से घिर गया और कारसेवकों ने ढांचे के गुम्बद पर चढ़कर उसके शिखर पर भगवा ध्वज फहरा दिया। 30 अक्टूबर 1990 को बाबरी ढांचे पर चढ़े कारसेवकों और उसपर लहराते भगवे का वो दृश्य उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के उस कठोर दावे के मुंह पर जोरदार थप्पड़ की तरह था, जिन मुलायम सिंह यादव ने पुलिस बल के 40 हज़ार जवानों की भारी भरकम फौज तैनात कर के ये दावा कर दिया था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा। इन सब के बाद भी एक सवाल ज़हन में ज़रूर उठता है कि आखिर वो साधु गया कहां। और कौन था वो साधु जो 40 हज़ार जवानों पर भी भारी पड़ गया था। जिसने बाबरी ढांचे पर भगवा रंग फहराने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। दोस्तों ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आजतक कोई नहीं दे पाया है।
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