न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि यह SC में ज्यादा नहीं है क्योंकि जब तक वे SC में पहुंचते हैं वे काफी परिपक्व हो जाते हैं

न्यायमूर्ति एके सीकरी ने रविवार को कहा कि न्यायिक प्रक्रिया दबाव में है और किसी मामले पर सुनवाई शुरू होने से पहले ही लोग बहस करने लग जाते हैं कि इसका फैसला क्या आना चाहिए. इसका न्यायाधीशों पर प्रभाव पड़ता है. न्यायमूर्ति सीकरी ने लॉएशिया के पहले सम्मेलन में ”डिजिटल युग में प्रेस की स्वतंत्रता” विषय पर चर्चा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता नागरिक और मानवाधिकार की रूप-रेखा और कसौटी को बदल रही है और मीडिया ट्रायल का मौजूदा रुझान उसकी एक मिसाल है.

उन्होंने कहा, ”मीडिया ट्रायल पहले भी होते थे. लेकिन आज जो हो रहा है वह यह कि जैसे की कोई मुद्दा बुलंद किया जाता है, एक याचिका दायर कर दी जाती है. इस (याचिका) पर सुनवाई शुरू होने से पहले ही लोग यह चर्चा शुरू कर देते हैं कि इसका फैसला क्या होना चाहिए. यह नहीं कि फैसला क्या ‘है’, (बल्कि) फैसला क्या होना चाहिए. और मेरा तजुर्बा है कि न्यायाधीश कैसे किसी मामले का फैसला करता है, इसका इस पर प्रभाव पड़ता है.” 

न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा, ”यह सुप्रीम कोर्ट में ज्यादा नहीं है क्योंकि जब तक वे सुप्रीम कोर्ट में पहुंचते हैं वे काफी परिपक्व हो जाते हैं और वे जानते हैं कि मीडिया में चाहे जो भी हो रहा है उन्हें कानून के आधार पर मामले का फैसला कैसे करना है. आज न्यायिक प्रक्रिया दबाव में है.” 

उन्होंने कहा, ”कुछ साल पहले यह धारणा थी कि चाहे सुप्रीम कोर्ट हो, हाईकोर्ट हों या कोई निचली अदालत, एक बार अदालत ने फैसला सुना दिया तो आपको फैसले की आलोचना करने का पूरा अधिकार है. अब जो न्यायाधीश फैसला सुनाते हैं, उनको भी बदनाम किया जाता है या उनके खिलाफ मानहानिकारक भाषण दिया जाता है.” सम्मेलन को संबोधित करने वालों में शामिल अतिरिक्त सालिसिटर जनरल माधवी गोराडिया दीवान ने भी इसी तरह के विचार पेश किए. उन्होंने कहा कि खबर और फर्जी खबर, खबर और विचार, नागरिक और पत्रकार के बीच का फर्क धुंधला हो गया है. उन्होंने कहा कि एक चुनौती यह भी हो गई है कि वकील भी कार्यकर्ता बन गए हैं.

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