बदलते दौर के समाज में बेटियां भी बखूबी उन जिम्मेदारियों को उठा सकती हैं

बदलते दौर के समाज में बेटियां भी बखूबी उन जिम्मेदारियों को उठा सकती हैं, जिन पर रूढ़ि‍वादी समाज सिर्फ बेटों का हक होने की दुहाई देता है। ऐसी ही एक बेटी है दिवंगत उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी अभय बहुगुणा की 15 वर्षीय बेटी तेजस्विनी बहुगुणा। पिता की आकस्मिक मृत्यु होने पर उसने न केवल परिवार को हिम्मत बंधाई, बल्कि मृत्योपरांत किए जाने वाले क्रियाकर्मों को निभाने का संकल्प भी लिया।

टीचर्स कॉलोनी गोविंदगढ़ निवासी राज्य आंदोलनकारी अभय बहुगुणा का गत 26 नवंबर को आकस्मिक निधन हो गया था। जब अभय की पार्थिव देह घर लाई गई तो आंसुओं के सैलाब में डूबी उनकी मां की बूढ़ी आंखें बस एक ही चिंता में घुली जा रही थीं कि अब बेटे के अंतिम संस्कार की रस्में कौन पूरी करेगा। इसी दुविधा में बेबस मां एकटक बेटे की पार्थिक देह को निहार रही थी।

दादी की इस बेबसी को देख तब पोती तेजस्विनी ने दादी का कंधा पकड़ा और बोली किसे ढूंढ रही हो दादी, मैं हूं ना। मैं पूरी करूंगी अपने पिता के अंतिम संस्कार की रस्में। इसके बाद तेजस्विनी ने न सिर्फ पिता की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि हरिद्वार के खड़खड़ी घाट पर उन्हें मुखाग्नि भी दी। अब वह क्रियाकर्म की अन्य सभी रस्मों को भी विधि-विधान से निभा रही है।

एनमेरी स्कूल में दसवीं कक्षा की छात्रा तेजस्विनी कहती है कि पिता ने उसे आत्मविश्वास और हर परिस्थिति से लड़ने का जज्बा दिया। उन्होंने खुद भी उत्तराखंड राज्य की लड़ाई लड़ी। उन्हीं से यह गुण उसे मिला है। बोर्ड की परीक्षा की तैयारी भी वह क्रिया में बैठकर ही कर रही है, क्योंकि उसने पिता से दसवीं में अच्छे अंक लाने का वादा किया है। दादी कुसुम बहुगुणा कहती हैं कि तेजस्विनी पर इसके लिए किसी ने दबाव नहीं डाला।
उसने जो हिम्मत और समझदारी दिखाई उससे परिवार को भी आत्मबल मिला है। मां विनीता बुहुगुणा का कहना है कि उनके पति ने तेजस्विनी को आत्मविश्वास से जीना सिखाया है। उसका यही आत्मविश्वास इस दुख की घड़ी में पूरे परिवार का संबल बन रहा है।
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