बैंकों के अच्छे दिन आने में अभी लगेगा समय…

लोन डिफॉल्ट के जख्म और नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) के सिरदर्द से परेशान सरकारी बैंकों की मुश्किलें खत्म नहीं हो रही है। सार्वजनिक बैंकों को इस वर्ष मार्च में खत्म वित्त वर्ष के दौरान कुल 87,300 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। बैंकों द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष के दौरान 21 सार्वजनिक बैंकों में से सिर्फ इंडियन बैंक और विजया बैंक मुनाफे में रहे, जबकि बाकी 19 बैंकों को घाटे का सामना करना पड़ा। इनमें पीएनबी और आइडीबीआइ बैंक की हालत सबसे ज्यादा खराब रही।

आंकड़ों के मुताबिक इंडियन बैंक के 1,258.99 करोड़ रुपये और विजया बैंक के 727.02 करोड़ रुपये मुनाफे को घटा दें, तो पिछले वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों का शुद्ध घाटा 85,370 करोड़ रुपये रहा। हालांकि लगातार सामने आए घोटालों के बाद एनपीए को लेकर स्थिति बहुत हद तक साफ हो चुकी है और उससे निपटने की कोशिशें भी शुरू की जा चुकी है, जिससे स्थिति के धीरे-धीरे सामान्य होने की उम्मीद जताई होने लगी है।

केजरीवाल एंड इन्वेस्टमेंट सर्विस के सचिव अरुण केजरीवाल बताते हैं कि बैंकिंग सेक्टर की मुश्किलें जिस तरह से एक-एक करके सामने आ रही हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकारी बैंकों का मौजूदा मर्ज ठीक होने में अभी कम से कम दो तिमाही का वक्त लग सकता है।

उन्होंने कहा कि अच्छी स्थिति यह है कि इस दिशा में प्रयास शुरू हो चुके हैं। गौरतलब है कि घाटे का सामना कर रहे सरकारी बैंक कर्ज की वसूली के साथ ही, अपनी नॉन कोर संपत्तियों को बेचने की योजना पर काम कर रहे हैं, ताकि पूंजी पर्याप्तता के जरूरी मानक को बरकरार रखी जा सके। मसलन हाल ही में पीएनबी (पंजाब नैशनल बैंक) ने पीएनबी हाउसिंग और अन्य इकाइयों बीएसई, इक्रा तथा क्रिसिल में अपनी हिस्सेदारी बेचेगी।

बेल ऑउट पैकेज में किन्हें मिलेगी तरजीह?

वहीं दूसरी तरफ सरकार, बेल आउट पैकेज के जरिए बैंकों में पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की कोशिशों में लगी हुई है। बैंकों की आर्थिक हालत दुरुस्त करने के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये के पुर्नपूंजीकरण का ऐलान किया था, जिसकी पहली किस्त भी जारी की जा चुकी है और सरकार की और से इसकी दूसरी किस्त की घोषणा की जानी है।

तो क्या इस पैकेज में उन बैंकों को ज्यादा पूंजी मुहैया कराई जाएगी, जिनकी हालत ज्यादा खराब है?

केजरीवाल बताते हैं, ”जाहिर तौर पर जिन बैंकों की हालत ज्यादा खराब होगी उन्हें ज्यादा पैसा मिलेगा। लेकिन बेलऑउट पैकेज उन बैंकों को तरजीह मिलेगी जिन्होंने अपनी तरफ से पूंजी जुटाने के प्रयास किए हैं।”

यानी जो बैंक वित्तीय संकट के इस दौर में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाली बेलआउट पैकेज में ज्यादा तवज्जो नहीं मिलेगी।

बैंकिंग स्टॉक्स में क्या करें निवेशक?

घोटालों के सामने आने के बाद बाजार में सूचीबद्ध अधिकांश सरकारी कंपनियों के शेयर अपने न्यूनतम स्तर या उसके आस-पास ट्रेड कर रहे हैं।

बीते छह महीनों की बात करें तो पीएनबी बैंक का शेयर 51 फीसद, बैंक ऑफ बड़ौदा का शेयर बीते छह महीने में 26 फीसद, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बीते 6 महीने में 15.3 फीसद और इलाहाबाद बैंक का शेयर बीते 6 महीने में करीब 41 फीसद तक टूट चुका है। ऐसे में निवेशकों के सामने दुविधा की स्थिति बनी हुई है।

केजरीवाल बताते हैं, ”बदहाल स्थिति के कारण सरकारी बैंकों के टूटते शेयर्स के मद्देनजर निवेशकों को अभी स्थितियां सुधरने का इंतजार करना चाहिए। जब तक हालात नहीं सुधरते हैं निवेशकों को सरकारी बैंकों के शेयर्स की खरीदारी या बिकवाली से दूर रहना चाहिए।”

केजरीवाल बताते हैं कि सरकारी बैंकों की स्थितियां जितनी ‘असामान्य’ हैं उनके सामान्य होने के दो ही तरीके हैं। पहला तरीका यह है कि सरकार अपनी तरफ से बैंकों में पैसा डालकर गड्ढे भरने का काम करे, या फिर बैंक रिकवरी के जरिए अपनी बैलेंस सीट को दुरुस्त करने का काम करे। लेकिन बैंकों का मुख्य काम बैंकिंग का होता है और ऐसे में वह अपनी नॉन-बैकिंग कंपनियों की हिस्सेदारी बेंचकर पैसा जुटाती है।

केजरीवाल ने कहा कि घोटाले की वजह से बैंकों की पूंजी को जबरदस्त नुकसान पहुंचा है, जो पूंजी डालने से ही सामान्य होगी। हालांकि इन सबके बावजूद बैंकों को सामान्य स्थिति में लाने में 2 से 3 तिमाहियों का वक्त लग जाएगा।

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