महाराजा रंजीत सिंह का तरकश 23 अक्टूबर को लंदन में होगा नीलाम

महाराजा रंजीत सिंह के धनुष और तीर रखने के लिए बना बेहिसाब कीमती शाही तरकश लंदन में इसी माह के अंत में नीलाम होगा। भारतीय खजाने की यह अमूल्य धरोहर मखमली कपड़े में लिपटी और चमड़े की पट्टी से कसी है। इसके ऊपर सोने के तार की बेहद खूबसूरत कारीगरी की गई है। बोहम्स की इस नीलामी में महारानी रंजीत सिंह की रानी जिंदन कौर का बेशकीमती पन्ने और मोती का हार भी नीलाम होगा। सिख महाराजा और पंजाब के शेर के नाम से विख्यात महाराजा रंजीत सिंह इस विशेष तरकश का इस्तेमाल युद्ध में नहीं करते थे। बल्कि इसका उपयोग विशेष समारोहों और अवसरों पर किया जाता था। 23 अक्टूबर को बोहम्स और इंडियन आर्ट सेल में होने वाली इस नीलामी में तरकश की अनुमानित कीमत 80 हजार पौंड (करीब 78 लाख रुपये) और एक लाख बीस हजार पौंड (करीब एक करोड़ 17 लाख रुपये) के बीच होगी।

बोहम्स में भारतीय और इस्लामिक कला के प्रमुख ओलिवर व्हाइट ने बताया कि यह बेहद आकर्षक कलाकृति लाहौर के खजाने से आया है। और इसके सभी साक्ष्य बताते हैं कि यह वर्ष 1838 में शेर-ए-पंजाब महाराजा रंजीत सिंह के लिए बनाया गया था। उन्होंने बताया कि यह तरकश खास अवसरों के लिए ही था। इसलिए ऐसा लगता है कि इसका इस्तेमाल बहुत कम हुआ है। इसीलिए यह अब तक इतनी अच्छी हालत में है।

आर्ट गैलरी बोहम्स के इतिहासकारों का कहना है कि धनुष विद्या की सिखों की सैन्य संस्कृति में अहम भूमिका थी। आधुनिक हथियार आने के बावजूद सिखों ने सांस्कृतिक धरोहर के रूप में समारोहों और सांकेतिक रूप में तीर-धनुष का इस्तेमाल जारी रखा था। बताया जाता है कि महाराजा जनता के सामने जाने पर अपने बगल में इस कशीदेकारी वाले तरकश को लटकाते थे।

बताया जाता है कि महाराजा रंजीत सिंह ने 1838 में अपने सबसे बड़े बेटे और उत्तराधिकारी खड़क की शादी पर इसे अपने लिए बनवाया था। बताया जाता है कि उसी वर्ष एक फ्रेंच कलाकार अल्फ्रेड डी ड्रॉक्स ने इसे लिए हुए उनकी पेंटिंग भी बनाई थी जो अब पेरिस के लॉरे म्यूजियम में है।

महाराजा रंजीत सिंह की मृत्यु 1839 में हुई। उसके बाद पंजाब की अस्थिरता का फायदा उठाकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने युद्ध छेड़कर लड़ाई जीत ली। 1846 में युद्ध जीतने के बाद इस कंपनी ने लाहौर के शाही खजाने में बेशकीमती कोहिनूर हीरे और तिमूर माणिक (रूबी) के साथ रखवा दिया था। बाद में यह सारा बेशकीमती खजाना ब्रिटिश अफसरों ने इंग्लैंड की तत्कालीन महारानी विक्टोरिया के लिए बतौर भेंट लंदन भेज दिया।

अकेली ऐसी महारानी, जिन्होंने सती होना नहीं किया था स्वीकार

इसके अलावा लाहौर के खजाने से बिकने के लिए महाराजा रंजीत सिंह की पत्नी जिंदन कौर का बेशकीमती हार भी नीलाम होगा। बेहद खूबसूरत और फैशनेबल जिंदन कौर के पन्ने और मोती के इस हार की कीमत भी 80 हजार पौंड (करीब 78 लाख रुपये) और एक लाख बीस हजार पौंड (करीब एक करोड़ 17 लाख रुपये) के बीच बताई जा रही है।

जिंदन कौर महाराजा रंजीत सिंह की अकेली ऐसी रानी थीं जिन्होंने उनके निधन पर सती होना स्वीकार नहीं किया था। अपने पांच साल के बेटे दलीप को सत्ता दिलाने के लिए 1843 में जिंदन ने सेना खड़ी करके ब्रिटिश आक्रमणकारियों से लोहा लिया था। लेकिन बाद में उन्हें बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया।

काठमांडू में नेपाल के राजा के महल में नजरबंद जिंदन भागने में सफल रहीं और इंग्लैंड जाकर अपने बेटे और अपने जेवरात हासिल कर पाईं। इन जेवरों में उनका नीलाम होने वाला नेकलेस भी शामिल है। जिंदन के कान के दो बुंदे इसी साल अप्रैल में बोहम्स इस्लामिक और इंडियन आर्ट सेल में 1,75,000 पौंड में बिक चुके हैं। 

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