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रुक्मी – १: कृष्ण से बैर, युद्ध और पराजय

रुक्मी महाभारत का एक प्रसिद्ध पात्र है जो विदर्भ के राजा महाराज भीष्मक का सबसे बड़ा पुत्र था। महाराज भीष्मक के रुक्मी के अतिरिक्त तीन अन्य पुत्र और रुक्मिणी नामक एक पुत्री थी। रुक्मी युवराज था और विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर में अपने पिता की क्षत्रछाया में राज-काज संभालता था। बचपन से ही रुक्मी बहुत बलशाली और युद्ध विद्या में पारंगत था। किंपुरुष द्रुम उसके गुरु थे और उन्होंने रुक्मी को सभी प्रकार की युद्धकला में पारंगत किया था। इसके अतिरिक्त उसने भगवान परशुराम की कृपा से कई दिव्य अस्त्र भी प्राप्त किये थे। महाभारत में उसकी गिनती मुख्य अतिरथियों में की जाती है।
उसके पिता महाराज भीष्मक जरासंध के मित्र थे और रुक्मी स्वयं चेदिनरेश शिशुपाल का मित्र था। वो अपनी छोटी बहन रुक्मिणी से अत्यंत प्रेम करता था और उसका विवाह आर्यावर्त के श्रेष्ठ नरेश से करना चाहता था। रुक्मिणी के लिए उसने शिशुपाल को योग्य वर माना और अपने इस निर्णय के विषय में अपने पिता भीष्मक को बताया। यद्यपि भीष्मक रुक्मिणी का स्वयंवर करवाने के पक्ष में थे किन्तु शिशुपाल कुलीन और वीर तो था ही, साथ ही साथ जरासंध का कृपापात्र भी था। इसी कारण भीष्मक को भी शिशुपाल के साथ रुक्मिणी के विवाह में कोई अड़चन दिखाई नहीं दी।
दूसरी और रुक्मिणी ने मन ही मन में श्रीकृष्ण को अपना पति मान लिया था। जब उसे पता चला कि उसके पिता और भाई रुक्मी ने शिशुपाल से उसका विवाह निश्चित करने का निर्णय लिया है तो उसने अपने पिता और रुक्मी को श्रीकृष्ण के बारे में बताया। रुक्मी कृष्ण को पसंद नहीं करता था। उसकी श्रीकृष्ण से कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं थी किन्तु वो आर्यावर्त में कृष्ण के बढ़ते हुए प्रभाव से प्रसन्न नहीं था। एक तो श्रीकृष्ण के सामने वो अपना महत्त्व कम होते हुए नहीं देख सकता था और दूसरे वो रुक्मिणी का विवाह यादवकुल में नहीं करना चाहता था। इसीलिए जब उसे रुक्मिणी के निर्णय के बारे में पता चला तो उसने रुक्मिणी पर कड़ा प्रतिबन्ध लगा दिया।
इस परिस्थिति के कारण उसने रुक्मिणी का विवाह अतिशीघ्र करने का निर्णय लिया। हालाँकि भीष्मक को रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण के साथ करने में कोई आपत्ति नहीं थी किन्तु अपने पुत्र के हठ के कारण उन्हें उसकी बात माननी पड़ी। रुक्मी ने शिशुपाल को एक पत्र लिखा कि वो तत्काल अपनी सेना के साथ कुण्डिनपुर आ जाए ताकि उसका और रुक्मिणी का विवाह शीघ्र कर दिया जाये। रुक्मी का पात्र पढ़ते ही शिशुपाल तत्काल अपनी सेना सहित विदर्भ की ओर चल पड़ा।
उधर रुक्मिणी ने अपने एक दूत के हांथों एक पत्र श्रीकृष्ण के पास भिजवाया। उस पात्र में उन्होंने श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। कृष्ण ने भी रुक्मिणी के विषय में बहुत कुछ सुन रखा था और वैसे भी नियति ने तो उन दोनों का मिलन पूर्व निश्चित कर रखा था। उन्हें पता था कि रुक्मी के रहते वे रुक्मिणी से विवाह तो नहीं कर सकते इसी कारण उन्होंने रुक्मिणी के हरण का विचार किया। ये सोच कर वे अकेले अपने सारथि दारुक के साथ विदर्भ की और चल पड़े। उनके जाने के बाद जब बलराम को इसकी सूचना मिली तो वे बड़ा बिगड़े और तुरंत अपनी सेना लेकर कृष्ण के पीछे उनकी मदद को चल पड़े।
उधर शिशुपाल अपने दल-बल के साथ कुण्डिनपुर पहुँच चुका था। शिशुपाल और रुक्मिणी के विवाह का मुहूर्त तीन दिन बाद रखा गया। शिशुपाल स्वयं कृष्ण का बहुत बड़ा विरोधी था और जब उसे पता चला कि रुक्मिणी श्रीकृष्ण से प्रेम करती है तो वो बड़ा प्रसन्न हुआ। रुक्मिणी के साथ विवाह को उसने कृष्ण के विरुद्ध अपनी विजय ही माना और विवाह के दिन की प्रतीक्षा करने लगा।
उधर श्रीकृष्ण गुप्त रूप से कुण्डिनपुर पहुँच गए थे। विवाह के दिन नियम के अनुसार जब रुक्मिणी माँ पार्वती की पूजा करने मंदिर गयी तो वही से श्रीकृष्ण ने उनका अपहरण कर लिया। ये खबर आग की तरह फैली। जैसे ही रुक्मी को पता चला कि कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर लिया है तो वो क्रोध से पागल हो गया। उसी उसने अपनी सेना को कृष्ण के पीछे जाने का आदेश दिया। उसी समय पता चला कि बलराम भी अपनी सेना लेकर कुण्डिनपुर पहुँच चुके हैं। ये समाचार मिलते ही शिशुपाल चेदि और विदर्भ की सेना लेकर बलराम का सामना करने गया और रुक्मी अकेला ही कृष्ण को रोकने निकल पड़ा।
बलराम ने कृष्ण से तुरंत द्वारका पहुँचने को कहा और अपनी सेना के साथ शिशुपाल से भिड़ गए। उधर कृष्ण तीव्र गति से कुण्डिनपुर से बाहर निकल चुके थे किन्तु जैसे ही उन्हें पता चला कि रुक्मी उनसे युद्ध करने आ रहा है वे कुण्डिनपुर के पश्चिम में भोजकट नामक स्थान पर ही रुक गए और रुक्मी की प्रतीक्षा करने लगे। शीघ्र ही रुक्मी वहाँ पहुँचा और श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। फिर दोनों में भयानक युद्ध आरभ हुआ।
रुक्मी धनुर्विद्या में पारंगत था और साथ ही कई दिव्यास्त्रों का ज्ञान भी उसे था। उसके पास भी ‘विजय’ नामक उत्तम धनुष था (ये विजय कर्ण के महान विजय धनुष से अलग है) जो किसी भी सेना को परास्त करने की शक्ति रखता था। दोनों में युद्ध आरम्भ हुआ और बड़ी देर तक चला। रुक्मी एक महान योद्धा था किन्तु कृष्ण की शक्ति के सामने कब तक टिकता? अंततः उसकी पराजय हुई। कृष्ण उसका वध करना ही चाहते थे किन्तु रुक्मिणी से अपने भाई की ये दशा देखी नहीं गयी और उसके अनुरोध पर कृष्ण ने रुक्मी को जीवन दान दिया।
कृष्ण ने उसे छोड़ तो दिया किन्तु पराजय के रूप में उन्होंने उसका सर मुड़ दिया और फिर रुक्मिणी के साथ द्वारका चले गए। उधर बलराम ने भी शिशुपाल को परास्त कर दिया और वापस द्वारका की और चले। रुक्मी को ये अपमान सहन नहीं हुआ और इससे वो इतना व्यथित हुआ कि वापस लौटकर कुण्डिनपुर गया ही नहीं। उसने उसी भोजकट में अपनी राजधानी बनाई और वहीँ से विदर्भ का राज्य सँभालने लगा। उस घटना के बाद से उसका श्रीकृष्ण के प्रति बैर और बढ़ गया। 
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