लगातार बढ़ रहीं मौत की चीखों को नहीं कम कर सकता सरकारों का मुआवज़ा

कानपुर के पुखरायां में हुआ रेल हादसा कहीं न कहीं हुई रेल विभाग की लापरवाही को उजागर करता है। इस हादसे में 142 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। और यहीं पर ही नहीं जैसे जैसे रेस्क्यू ऑपरेशन आगे बढ़ रहा है लाशों की संख्या भी बढ़ रही है। हादसे के बाद से तो कई लोगों का कुछ पता नहीं हैं। अस्पतालों में इमरजेंसी जैसा हाल है। राज्य और केंद्र सरकारें शोक जता रही हैं अफसोस मना रही हैं और पीड़ितों को मुआवजा देने की तैयारी में हैं क्या उनके अफसोस मनाने से लाशों में जान आ जायेगी । मुआवजा देने से मासूमों के चेहरे की वो खुशी वापस ला पायेंगी सरकारें। जो उस ट्रेन में ही दर्दनाक चीखें बनकर गुम हो गयीं। वो लोग उस मुआवजे पर अपने गम को कैसे कम करेंगे जिनका तो पूरा परिवार ही उजड़ गया। सरकारें किसे देंगी मुआवजा जब परिवार में कोई मुआवजा लेने वाला बचा ही नहीं। जिसने अपना बेटा अपने माँ बाप बच्चे खोयें हैं क्या उनका गम कम हो जायेगा। इस वक्त उन पर क्या बीत रही है ये सोच कर ही मन सिहर उठता है। बहरहाल रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने मामले की जांच के आदेश दिये हैं लेकिन जब ट्रेन में ये हादसा नही हुआ था क्या उस वक्त इतनी सख्ती से जांच नहीं की गयी थी शायद की गयी होती तो ऐसा नहीं होता आज जो दर्द की चीखें हमारे कानों में गूंज रहीं हैं वो नहीं होती कोई बाप अपने बेटे से दूर नहीं होता किसी के घर में बज रहीं शहनाईयां जो आज मातम में बदल गयी हैं वहां भी खुशियां होतीं।

Huma Alam

humaalam1234@gmail.com

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इंदौर पटना एक्सप्रेस ट्रेन जिस वक्त इंदौर से चली तब तक सब कुछ ठीक था। गाड़ी जब झांसी स्टेशन पर रुकी तो इसकी जांच हुयी लोको पायलट और सहायक लोको पायलट ने इंजन की जांच की और गाड़ी में सबकुछ दुरुस्त होने पर गाड़ी 11.56 पर चल दी। और जब गाड़ी पुखरायां और मलासा स्टेशनों पर तेज रफ्तार में दौड़ रही थी। उस वक्त ट्रेन में कोई अपने बच्चे को प्यार कर रहा था तो कोई अपने घर पर फोन कर अपनी सलामती के बारे में बता रहा था। कोई मोबाइल में गाने सुन रहा था तो कोई सो रहा था ट्रेन में उस वक्त एक सुकून होगा किसी को भी इस आने वाले तूफान का कोई गुमान न था। लेकिन 03 बजकर 03 मिनट पर जब गाड़ी अपनी रफ्तार पर थी। अचानक कुछ ऐसा हुआ कि एक को दूसरे को खबर ना रही सब तहस नहस रात का वो सन्नाटा चीख पुकार में तब्दील हो गया 14 डिब्बे एक दूसरे पर सवार थे। चारो तरफ चीखें रोना ही था।

आख़िर लोको पायलट ने क्यों लगाया इमरजेंसी ब्रेक अगर ड्राइवर की मानें तो ओएचई लाइन में स्पार्किंग होने के बाद तगड़ा जर्क लगा जिसकी वजह से ट्रेन पटरी से उतर गयी। वहीं अगर यात्रियों की मानें तो उन्हें पहले से ट्रेन में कुछ आवाज सी सुनाई दे रही थी जिसकी जानकारी भी उन्होनें दी थी। लेकिन उसे संज्ञान में नहीं लिया गया। इस हादसे के बाद से अस्पतालों में घायलों और पीड़ितों के परिजनों का तांता लगा हुआ है।

जब ट्रेन में सब ओके था तो हादसा हुआ कैसे इस बात का खुलासा तो अभी तक नहीं हुआ है बात अगर ट्रेन की पटरियों में फॉल्ट की की जाये तो कुछ समय पहले ही उसी ट्रैक पर साबरमती एक्सप्रेस सही सलामत निकल कर गयी। रेल प्रशासन अगर इतना सजग पहले से होता तो शायद 2010 के बाद इतना खतरनाक और दर्दभरा ये हादसा आज न हुआ होता।

इससे पहले इतना भयानक रेल हादसा 2010 में हुआ था। 19 जुलाई 2010 को पश्चिम बंगाल में उत्तर बंग एक्सप्रेस और वनांचल एक्सप्रेस में टक्कर हुई थी। इस हादसे में 62 लोगें की मौत और  डेढ़ सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे। लगता है उस हादसे से भी प्रशासन की नींद नहीं खुली और ये हादसा हो गया। ट्रेनों में अगर कोच को लिंक हाफ मैन बुश कोच से लैस कर दिया जाये तो हादसे इतने भयानक होने के आशंका नहीं होगी। एलएचबी कोच एंटी टेलीस्कोपिक तकनीक पर आधारित होता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि ट्रेन के टक्कर या ट्रेन के पटरी से उतरने पर एक कोच दूसरे में नहीं घुसती है। अर्थात दुर्घटना की स्थिति में पीछे वाला कोच आगे वाले कोच के ऊपर चला जाता है इससे कम लोग दुर्घटना के शिकार होते है। लेकिन अभी भी इस तरह के कोच के इस्तेमाल में रेलवे काफी सुस्ती बरत रहा है। जर्मन तकनीक पर अब लिंक हॉफ मैन बुश (एलएचबी) कोच भारत में भी बनने लगा है, लेकिन इस तरह के कोच के निर्माण की गति काफी धीमी है। अभी तक इस तकनीक वाले 3800 कोच है। इस तरह के एसी कोच बनाने पर 230 लाख और स्लीपर कोच के लिए 170 लाख रुपये का खर्च आता है।

अगर ट्रेनों के लिये इस तरह की सावधानियां पहले से ही यूज कर ली जाती तो इतना बड़ा हादसा आज शायद न हुआ होता।

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