हार का सबसे बड़ा नासूर, जिसे टीम इंडिया हमेशा छुपाती रही…

आखिर वही हुआ, जिसका डर था. टीम इंडिया आईसीसी विश्व कप में खिताब के बेहद करीब पहुंचकर भी खाली हाथ रही. वैसे, यह पहली बार नहीं है, जब हम विश्व कप से खाली हाथ लौट रहे हैं. यह जरूर पहली बार है कि जब नंबर-1 टीम, नंबर-1 बैट्समैन, नंबर-1 बॉलर सबकुछ हमारे हैं. फिर भी हम हार का गम गलत कर रहे हैं. अब समीक्षाओं का दौर चलेगा. कोचिंग स्टाफ पर गाज गिरेगी. लेकिन हार की सबसे बड़ी वजह की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले. वो वजह, जिसका अंदाजा सबको था. जिसे सुलझाने की बजाय लगातार उलझाया गया और इसमें कोच रवि शास्त्री, कप्तान विराट कोहली और चयनकर्ताओं ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया. 

बात हो रही है टीम इंडिया के उस नंबर-4 की, जिसके बारे में क्रिकेटप्रेमियों को तो छोड़िए, इस नंबर पर खेलने वाले खिलाड़ी को भी पता नहीं रहता है कि वह अगले कितने मैच खेलेगा. जबरिया पैदा की गई इस समस्या का नतीजा यह रहा कि विश्व कप में हमारा नंबर-4 का एक भी बल्लेबाज अर्धशतक तक नहीं बना सका.

विश्व कप के नौ मैचों में हमने नंबर-4 पर चार बल्लेबाजों को आजमाया. सबसे पहले केएल राहुल, फिर विजय शंकर, ऋषभ पंत और हार्दिक पांड्या. इनमें से पांड्या को फ्लेक्सिबिलिटी के नाम पर अलग भी कर दें तो एक ही टूर्नामेंट में एक ही नंबर पर तीन बल्लेबाज…

बल्लेबाजी में नंबर-4 को टीम की रीढ़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. यह वो नंबर है, जो शुरुआती झटके लगने पर टीम को संभालता है और अच्छी शुरुआत मिलने पर बड़े स्कोर तक ले जाता है. मौजूदा विश्व कप के सेमीफाइनल में पहुंची चार में से तीन टीमों के पास नंबर-4 पर ऐसे ही दमदार खिलाड़ी हैं. आप वेस्टइंडीज के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया के नंबर-4 स्टीवन स्मिथ की मैच जिताने वाली पारी नहीं भूले होंगे. न्यूजीलैंड के नंबर-4 रॉस टेलर की बैटिंग सेमीफाइनल में भारत की हार की बड़ी वजह रही. वे इस विश्व कप में तीन फिफ्टी लगा चुके हैं. इंग्लैंड के नंबर-4 तो उसके कप्तान इयोन मोर्गन ही हैं, जिन्होंने इसी वर्ल्ड कप में एक ही पारी में 17 छक्के जड़ दिए थे.

और टीम इंडिया ने दो साल में नंबर-4 पर करीब 10 बल्लेबाज आजमा डाले. जैसे कुर्सी रेस चल रही हो. हर सीरीज में नए खिलाड़ी आते. जब वे टीम में होते तो कप्तान कोहली से लेकर कोच शास्त्री तक उसके कसीदे गढ़ते. नई सीरीज शुरू होती और नंबर-4 पर कोई और बैटिंग करता दिख रहा होता. जैसे कोई मजाक चल रहा हो. कप्तान विराट कोहली कई बार इन बदलावों को फ्लेक्सिबिलिटी के नाम पर जायज ठहराते रहे. अच्छा होता कि वे किसी एक खिलाड़ी पर भरोसा कर पाते.

भारत के टॉप-3 (रोहित, शिखर, विराट) दुनिया का सबसे मजबूत टॉप ऑर्डर है. इसके बावजूद सचिन तेंदुलकर से लेकर सौरव गांगुली तक यह बार-बार पूछते रहे कि जिस दिन रोहित और कोहली दोनों फेल हो गए, उस दिन क्या नंबर-4 टीम को संभाल पाएगा. विराट ब्रिगेड ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. विडंबना यह रही कि कोहली और शास्त्री के इस रुख को चयनकर्ताओं का भी पूरा साथ मिला. मुख्य चयनकर्ता एमएसके प्रसाद कभी अंबाती रायडू पर भरोसा जताते तो कभी विजय शंकर और ऋषभ पंत पर. हद तो तब हो गई, जब विजय शंकर के चोटिल होने पर रिजर्व अंबाती रायडू की जगह मयंक अग्रवाल को चुन लिया गया.

इसी साल जब फरवरी में अंबाती रायडू को बाहर बैठाकर विजय शंकर को नंबर-4 पर उतारा गया था, तब मैंने जी डिजिटल में ही लिखा था कि अब यह समस्या विश्व कप के बाद ही सुलझेगी. इसका कारण किसी खिलाड़ी के प्रति आग्रह या दुराग्रह नहीं था. कारण तो भरोसे का अभाव था, जो भारतीय टीम प्रबंधन अपने खिलाड़ियों के प्रति दिखा रहा था. जिस रायडू को नंबर-4 के नाम पर साल भर पाला-पोसा गया, उन्हें जैसे धक्के मारकर टीम से बाहर किया गया था. यहीं पर कप्तान कोहली सबसे बड़ी गलती कर रहे थे. उन्हें लगता था कि नए खिलाड़ी पर भरोसा जताकर वे उससे अच्छा प्रदर्शन करवा लेंगे. वे भूल गए कि जो नया खिलाड़ी इस नंबर पर आजमाया जा रहा है, तो उसे पिछले खिलाड़ी का हश्र पता है. यही कारण है कि नंबर-4 पर कोई भी खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर सका. उम्मीद है बीसीसीआई और टीम प्रबंधन इस गलती से सबक लेगा और कप्तान को आगे ऐसी गलती करने से रोकेगा.

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